चाय तुम्हारे चाह की …..!!!

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कल सपनों में चाय पे मिले थे हम, शायद यही तो एक वक़्त था जब सारे गिले शिकवे भुलकर एक दुसरे के आँखों में झाँकते हुए पूरी चाय गटक जाते थे। मुझे हर वक़्त जल्दी होती थी जाने की और तुम्हारा बदमाश मन हमेशा यही सोचता कि चाय थोड़ी और होती तो मेरे साथ कुछ और वक़्त मिल जाता। इन छोटी छोटी चीज़ों में भी तुम्हारी ख़ुशियाँ ढूँढने की आदत से ही तो मुझे बेइंतहाँ मुहब्बत थी, पर तुम्हें कभी बता नहीं पाया, और तुमने भी तो समझने की कोशिश नहीं की कभी, या शायद इसलिए नहीं समझा कि मैं कह दूँ अपने दिल की बात खुद ही कभी तुमसे। पर इतना आसान नहीं था मेरे लिए, क्यूँकि मैं तुम्हारी तरह बेबाक़ नहीं था, मन ही मन तुम्हारी बदमाशियाँ देखता, चाय के ग्लास को अपने अधरों से लगा कर वापस खींच लेते देखता। जानता था क्यूँ करती हो तुम ऐसा पर हमेशा पर हर बार ग़ुस्सा होने की ऐक्टिंग करता, कभी तुम्हें ज़्यादा बोलने के लिए डाँटता तो कभी थर्मोकोल के कप को अपने दातों से कुतरने के लिए।

पर इन सब बातों से परे जो कुछ बातें सदैव मेरे मन के कोने में चला करतीं थीं, पता नहीं कब और कैसे कह पाता? पर तुम्हारे हाथ में आते ही ये चाय का प्याला महज़ प्याला नहीं कलश लगता था और चाय जैसे हल्दी का ऊबटन। तुम्हारे साथ पिए हुए हर घूँट में मुहब्बत की तासीर थी जो हमेशा ही हमारी सोंधी मुहब्बत का स्वाद दे जाती थी। तुम्हारे साथ वक़्त यूँ कट जाता था, मानो पूरी ज़िन्दगी उसी चाय के प्याले में उतर आई हो। कहते हैं मोहब्बत रंग लाल होता है, मगर जब वह पीताभ लिए चाय के प्यालों में उतरता है तो मोहब्बत ज़िन्दगी बन जाती है।

जीवन तो बस जिए जाने का नाम है पर उसमें कोई तुम सा हमसफ़र मिल जाए तो जीवन ज़िन्दगी बन जाती है। ठीक उसी तरह चाय महज़ दूध, शक्कर, पत्ती और पानी का मिश्रण है…. मगर ताप के बिना उसका स्वाद कहाँ? और इस ज़िन्दगी का ताप बस मुहब्बत है, तुम्हारी मुहब्बत । हर रोज़ जब तुम अपने प्याले को डस्टबीन में डालती मैं ग़ौर से देखता उस प्याले को, प्याले के किनारों पर जो छाप छूटती थी तुम्हारे लबों की, जी करता रख लूँ हरेक प्याले को अपने पास संजो कर ताकि तुम पास न हो तब भी तुम्हारे लबों की छुवन को महसूस कर सकुँ। हमेशा जब भी तुमने चाय की चुस्कियाँ लीं थी हर बार अपने गले में तरावट महसूस किया था मैंने। यह सिर्फ़ चाय नहीं ज़िन्दगी की चाह थी हमारी।

पर ज़िन्दगी भी अज़ीब से खेल खेलती है …आज एक बार फिर से प्यालों में उतर आई है पर शायद वो मिठास, वो अपनापन सब कुछ बहुत पीछे छूट चुका है। ऐसी ही न जाने कितनी अनगिनत अनकही बातें हैं मेरे मन में तुम्हारे लिए जो शायद अब तो तुम तक पहुंचना नामुमकिन सा है, पर फिर भी कोशिश जारी है कि मिलो जीवन के किसी मोड़ पर, हो वही अदरक वाली चाय की प्याली हम दोनों के हाथों में और फिर चल पड़े बातों का सिलसिला, ठहाकों का दौर, कुछ अपनी कहो, कुछ मेरी सुनो। मैं मिलना चाहता हुँ, ढ़ेर सारी बातें करना चाहता हुँ, तुममें डूब जाना चाहता हुँ बस रोना नहीं चाहता, शायद डरता हुँ कि आंसुओं की नमकिनीयाँ हमारे चाय का स्वाद न बिगाड़ देI प्यालों में कैसे सिमटती है दुनिया….. कोई भूलने को होठों से लगाता है तो कोई आजीवन न भूलने को। न मिट्टी मिटेगी, न दूध! न मिठास लुप्त होगी न पानी ! न पत्तियां सूखेंगी न स्वाद जायेगा….. बस चाहता हूँ कोई यूँ ही पी ले मेरी मोहब्बत और कर जाए तुम्हारी कमी पूरी।

– अमर दीप पाण्डेय.

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