व्रत

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व्रत नहीं हूं..! मन के ऊपर है…! मन होता है तो पूरे नौ दिन रहता हूं..! मन हुआ तो पहला और आखिरी उपवास कर लिया..! मन नहीं हुआ तो वह भी नहीं…! कोई जिद नहीं करता कि रहना ही है…! हां मम्मी को लगता है कि यह पाप है तो मेरी जगह वह ही रह लेती है..! दोष उसका नहीं है, मां है वह..! बच्चे को हर बला से दूर रखने की कोशिशों में है यह…!

हम कूपमण्डूक हो चुके हैं…! हमारी परम्पराएं दम तोड रही हैं…! हम बाजारवाद के शिकार रहे ही, अब हमारे व्रत त्योहार भी इस बाजारवाद के शिकार हो चुके..! फिल्में और धारावाहिक तय करते हैं कि हम अपना पर्व कैसे मनाएंगे…! हमारे त्योहार की परम्पराएं नए रुप में हैं…! ढोंग तारी हो चुका है हम पर…! हम माता के जागरण की जगह गरबा नाइट सेलिब्रेट कर रहे हैं…! करिए, बिल्कुल करिए, हमको यह भी स्वीकार है…! पर देवी पूजन के नाम पर ऐसा दिखावा समझ से परे है…!

हम भीड़ हो चुके हैं…! वह भीड़ जो भेड़ का जमघट मात्र है, जिसने कसम खा रखी है कि नहीं हमको कुछ नहीं सुनना, हमने अपने इष्ट तय कर लिए, नवदेव हैं हमारे…! जाहिल हो चुके हैं हम..! वह भी किसलिए..? क्योंकि जाहिलो के एक समुदाय से हमारा कम्पटीशन चल रहा है..!

बहुत कुछ नहीं कहना है…! बस इतना ही कि अगर हमारी बुराइयों पर कोई ऊंगली इंगित कर रहा तो कम से कम उसे सेंटर से बाएं धकेलने से बचिए…!!!

अजय झा

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