एक मुलाकात

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“तुम्हें कैसे लोग पसंद हैं ?” मैंने बातों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए सोमायरा से पूछा।
“उम्म, मुझे ? मुझे वो जो कहानिया लिखते हैं, कवितायें लिखते हैं, अपने लिखे हुए ख़्यालों की दुनिया में पढ़ने वाले को भी ले जाते peहैं, वैसे लोग अच्छे लगते हैं।” सोमायरा अपने चेहरे पर आ रही घुंगराले बालों को अपने उँगलियों से कान के पीछे ले जाते हुए बोली।
फिर मेरी तरफ़ देखते हुए पूछी, ” और तुम्हें ?”
मैं आसमान की तरफ़ देखते हुए बोला, ” मुझे वैसे लोग अच्छे लगते, जिन्हें ये अजीबोग़रीब लोग अच्छे लगते हैं, पागल-सरफिरे क़िस्म के।”
“हम्म।” मुस्कुराते हुए फिर सोमायरा फिर से लटों को सुलझाने में जूट गयी और मैं उसके सुलझते लटों में उलझ गया।
कविता और शायरी तो मुझे ख़ाक न आते थे, एम् बी ए का बंदा जो ठहरा और वो भी मार्केटिंग से। मगर उसके बेपरवाह, उलझे बालों को देख कर अपनी पहली कविता सोचने लगा और फिर मेरी नींद खुल गयी अपने सपने से हकीकत की दुनिया में आ गया और आज एक शायर मेरे अंदर जन्म ले चुका था।

~अजय झा

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