वो रात

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Wo raat…

शब्दों की बोली, जो बोली तेरे रंग
मन चल उठा, तेरी डोली के संग
अब बोलो, कौन सा अपनाऊं मैं
तुझ बिन, अपने जी जाने का ढंग

दिल में दर्द है, मायूषी भी है थोड़ी
तुझे ले जाने कोई चढ़ के आया है घोड़ी
मन विचलित सा देखता बस तुझे है
अपने ही दिल से मैं कैसे लड़ू ये जंग

तेरी ही गुड मॉर्निंग से होते थे दिन के उजाले
अब आ चुकी है रात सब रंग हैं काले काले
तारा हूँ दूर से टिमटिमाना ही आता है
मेरा टुकड़ा चाँद का जा रहा और किसी के संग

अब न वो घंटों बातों की फुलझड़ियां सी होंगी
अब न वो तेरे मुस्कराहट की कुछ घड़ियां सी होंगी
अब न तेरा हाथ थाम राहों में चला करेंगे
तेरा हाथ बंधा है देखो, किसी अनजान के संग

तेरी कलाई में सजती बाला, लाल चूड़ियों से ढँक गया
इयररिंग्स की चमक, स्वर्ण आभूषण में बदल गया
गले की हार की किश्मत अब तुझसे बिछड़ जाने की है
अब सजने वाली है ये काले मोतियों बिच मंगलसूत्र के रंग

रो पड़ा हूँ पीड़ा सहकर अब तुझसे अपनी जुदाई का
तुम समझ ही बैठे गम है मुझे तेरी बिदाई का
ख़ुशी की ही तो चाह थी तेरी तब भी और अब भी
अब कौन करेगा सरारतों भरा पल पल मुझे तंग

कहते हो हम हैं हमेशा दोस्त जैसे
क्या तेरे सारे दोस्त हैं मुझ ही जैसे

अक्स की कलम से

Ashish Kumar Sinha
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Love to express feelings with word…

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